A história

Stupa em Ajanta

Stupa em Ajanta


We are searching data for your request:

Forums and discussions:
Manuals and reference books:
Data from registers:
Wait the end of the search in all databases.
Upon completion, a link will appear to access the found materials.


Cavernas de Ajanta (2 ° C. a.C. a 6 ° C. D.)

Um jovem capitão do exército britânico Smith estava em uma expedição particular de caça ao tigre no verão de 1819. Quando ele se aproximou de um ponto na colina de onde o rio Waghora emergiu, ele ouviu a chamada de alguém. Ele se virou para ver e era um menino pastor da aldeia, tentando dizer-lhe algo com gestos com as mãos. Smith entendeu que o menino estava apontando para um alto penhasco acima do rio e, em nenhum momento, Smith entendeu que o território do tigre começava do outro lado do rio.

Smith começou a descer lentamente a colina quando viu uma mancha vermelho-dourada entre alguns pilares ou colunas esculpidas em pedra. Esquecendo-se do tigre, Smith avançou em direção ao novo alvo e logo estava dentro Caverna No 10. O capitão John Smith marcou seu lugar na história como primeiro europeu a topar com as cavernas de Ajanta. Como outras inscrições antigas na caverna, ele também inscreveu com uma faca em um pilar “John Smith, 28ª Cavalaria e 28 de abril de 1819”. Capitão Smith, nunca imaginou que, duzentos anos depois, será lembrado para sempre na medida em que redescobriu as cavernas de Ajanta e, pouco mal visto que também foi o primeiro a vandalizar as pinturas com inscrição própria.


Ensaio de transição de nossa sociedade

A transição suave de nossa sociedade, de grupos nômades para vilas e estados, resultou no desenvolvimento de religiões, como resultado de ambientes sociais e políticos reformados. Onde tudo começou como outras crenças mundanas adotadas pelo pequeno grupo nômade e lentamente se desenvolveu em religiões totalmente desenvolvidas ao longo do tempo. A evidência mais antiga de religon encontrada no mundo foi no período Neolítico. As estatuetas encontradas dessa época, junto com os textos religiosos, refletem uma sociedade de religiosos


अनुक्रम

गुफाएँ एक घने जंगल से घिरी, अश्व नाल आकार घाटी में अजंता गाँव से 3½ कि॰मी॰ दूर बनी है। यह गाँव महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर से 106 कि॰मी॰ दूर बसा है। इसका निकटतम कस्बा है जलगाँव, जो 60 कि॰मी॰ दूर है, भुसावल 70 कि॰मी॰ दूर है। इस घाटी की तलहटी में पहाड़ी धारा वाघूर बहती है। यहाँ कुल 29 गुफाएँ (भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा आधिकारिक गणनानुसार) हैं, जो कि नदी दरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा आधिकारिक गणनानुसार) हैं, जो कि नदी द्वारा निर्मित एक प्रपात ेक े्षिण द्षिण द्षिण इनकी नदी से ऊँचाई 35 से 110 फीट तक ीकी है।

अजंता का मठ जैसा समूह है, जिसमें कई विहार (मठ आवासीय) एवं चैत्य गृह हैं (स्तूप स्मारक हॉल), जो कि दो चरणों में बने हैं। प्रथम चरण को गलती से हीनयान चरण कहा गया है, जो कि बौद्ध धर्म के हीनयान मत से सम्बन्धित है। वस्तुतः हिनायन स्थविरवाद के लिए एक शब्द है, जिसमें बुद्ध की मूर्त रूप से कोई निषेध नहीं है। अजंता की गुफा संख्या 9, 10, 12, 13 15 ए (अंतिम गुफा को 1956 में ही खोजा गया और अभी तक संख्यित नहीं किया गया है।) ोा इस चरण में खोजा गया और अभी तक संख्यित नहीं किया गया है।) को इस चरण में खोजा गया था। इन खुदाइयों में बुद्ध को स्तूप या मठ रूप में दर्शित किया गया है।

दूसरे चरण की खुदाइयाँ लगभग तीन शताब्दियों की स्थिरता के बाद खोजी गयीं। इस चरण को भी गलत रूप में महायान चरण 9 बौद्ध धर्म का दूसरा बड़ा धड़ा, जो कि कमतर कट्टर है, एवं बुद्ध को सीधे गाय आदि रूप में चित्रों या शिल्पों में दर्शित करने की अनुमति देता है.) कई लोग इस चरण को वाकाटक चरण कहते हैं। यह वत्सगुल्म शाखा के शासित वंश वाकाटक के नाम पर है। इस द्वितीय चरण की निर्माण तिथि कई शिक्षाविदों में विवादित है। हाल के वर्षों में कुछ बहुमत के संकेत इसे पाँचवीं शताब्दी में मानने लगे हैं। वॉल्टर एम ॰ स्पिंक, एक अजंता विशेषज्ञ के अनुसार महायन गुफाएँ 462-480 ई ॰ े के बीच निर्मित हुई थी। महायन चरण की गुफाएँ संख्या हैं 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 11, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28, एवं 29। गुफा संख्या 8 को लम्बे समय तक हिनायन चरण की गुफा समझा गया, किन्तु वर्तमान में तथ्यों के आधार पर इसे महायन घोषित किया गया है।

महायन, हिनायन चरण में दो चैत्यगृह मिले थे, जो गुफा संख्या 9 व 10 में थे। इस चरण की गुफा संख्या 12, 13, 15 विहार हैं। महायन चरण में तीन चैत्य गृह थे जो संख्या 19, 26, 29 में थे। अपने आरम्भ से ही अंतिम गुफा अनावासित थी। अन्य सभी मिली गुफाएँ 1-3, 5-8, 11, 14-18, 20-25, व 27-28 विहार हैं।

खुदाई में मिले विहार कई नापों के हैं, जिनमें सबसे बड़ा 52 फीट का है, प्रायः सभी वर्गाकार हैं। इनके रूप में भी भिन्नता है। कई साधारण हैं, तो कई अलंकृत हैं, कुछ के द्वार मण्डप बने हैं, तो कई के नहीं बने हैं। सभी विहारों में एक आवश्यक घटक है— एक वृहत हॉल कमरा। वाकाटक चरण वालों में, कईयों में पवित्र स्थान नहीं बने हैं, क्योंकि वे केवल धार्मिक सभाओं एवम् आवास मात्र हेतु बने थे बाद में उनमेंार्मिक सभाओं एवम् आवास मात्र हेतु बने थे बाद में उनमें पवित्। स ा फिर तो यह एक मानक बन गया। इस पवित्र स्थान में एक केन्द्रीय कक्ष में बुद्ध की मूर्ति प्रायः धर्म-चक्र-प्रवर्तन मुद्रा में बैठे हुए होती थी। जिन गुफाओं में नवीनतम विशेषताएँ हैं, वहाँ किनारे की दीवारों, द्वार मण्डपों पर और प्रांगण में गौण पवित्र स्थल भी बने दिखते हैं। कई विहारों के दीवारों के फलक नक्काशी से अलंकृत हैं। दीवारों और छतों पर भित्ति चित्रण किया हुआ है।

प्रथम शताब्दी में हुए बौद्ध विचारों में अन्तर से, बुद्ध को देवता का दर्जा दिया जाने लगा और उनकी पूजा होने लगी। परिणामतः बुद्ध को पूजा-अर्चना का केन्द्र बनाया गया जिससे महायन की उत्पत्ति हुई।

पूर्व में, शिक्षाविदों ने गुफाओं को तीन समूहों में बाँटा था, किन्तु साक्ष्यों को देखते हुए और शोधों के चलते उसे नकार दिया गया। उस सिद्धान्त के अनुसार 200 ई ॰ पूर्व से 200 ई ॰ तक एक समूह, द्वितीय समूह छठी शताब्दी का और तृतीय समूह सातवीं शताब्दी का मा ा था।

आंग्ल-भारतीयों द्वारा विहारों हेतु प्रयुक्त अभिव्यंजन गुफा-मंदिर अनुपयुक्त माना गया। अजंता एक प्रकार का महाविद्यालय मठ था। ह्वेन त्सांग बताता है कि दिन्नाग, एक प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक, तत्वज्ञ, जो कि तर्कशास्त्र पर कई ग्रन्थों के लेखक थे यह अभी अन्य साक्ष्यों से प्रमाणित होना शेष है। अपने चरम पर विहार सैंकड़ों को समायोजित करने की सामर्थ्य रखते थे। यहाँ शिक्षक और छात्र एक साथ रहते थे। यह अति दुःखद है कि कोई भी वाकाटक चरण की गुफा पूर्ण नहीं है। यह इस कारण हुआ कि शासक वाकाटक वंश एकाएक शक्तिविहीन हो गया, जिससे उसकी प्रजा भी संकट में आ गयी। इसी कारण सभी गतिविधियाँ बाधित होकर एकाएक रूक गयीं। यह समय अजंता का अंतिम काल रहा।

यह एक प्रथम कदम है और इसका अन्य गुफाओं के समयानुसार क्रम से कोई मतलब नहीं है। यह अश्वनाल आकार की ढाल पर पूर्वी ओर से प्रथम गुफा है। स्पिंक के अनुसार इस स्थल पर बनी अंतिम गुफाओं में से एक है और वाकाटक चरण के समाप्ति की ओर है। हालाँकि कोई शिलालेखित साक्ष्य उपस्थित नहीं हैं फिर भी यह माना जाता है कि वाकाटक राजा हरिसेना इस उत्तम संरक्षित गुफा के संरकषितक हेा के संरकटक हेा के ोई इसका प्रबल कारण यह है कि हरिसेना आरम्भ में अजंता के संरक्षण में सम्मिलित नहीं था, किन्तु लम्बे समय तक इनसे अलग नहीं रह सका, क्योंकि यह स्थल उसके शासन काल में गतिविधियों से भरा रहा और उसकी बौद्ध प्रजा को उस हिन्दू राजा का इस पवित्र कार्य को आश्रय देना प्रसन्न कर सकता था। यहाँ दर्शित कई विषय राजसिक हैं।

इस गुफा में अत्यंत विस्तृत नक्काशी कार्य किया गया है, जिसमें कई अति उभरे हुए शिल्प भी हैं। यहाँ बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित कई घटनाएँ अंकित हैं, साथ ही अनेक अलंकरण नमूने भी हैं। इसका द्वि-स्तंभी द्वार-मण्डप, जो उन्नीसवीं शताब्दी तक दृश्य था (तब के चित्रानुसार), वह अब लुप्त हो चुका है। इस गुफा के आगे एक खुला स्थान था, जिसके दोनों ओर खम्भेदार गलियारे थे। इसका स्तर अपेक्षाकृत ऊँचा था। इसके द्वार मण्डप के दोनों ओर कोठियाँ हैं। इसके अन्त में खम्भेदार प्रकोष्ठों की अनुपस्थिति बताती है कि यह मण्डप अजंता के अन्तिम चरण के साथ नहीं बना था, जब कि खम्भेदार प्रकोष कचु एचु ा पोर्च का अधिकांश क्षेत्र कभी मुराल से भरा रहा होगा, जिसके कई अवशेष अभी भी शेष हैं। यहाँ तीन द्वार पथ हैं, एक केन्द्रीय व दो किनारे के। इन द्वारपथों के बीच दो वर्गाकार खिड़कियाँ तराशी हुई है, जिनसे अंतस उज्ज्वलित होता था।

महाकक्ष (हॉल) की प्रत्येक दीवार लगभग 40 फीट लम्बी और 20 फीट ऊँची है। बारह स्तम्भ अन्दर एक वर्गाकार कॉलोनेड बनाते हैं जो छत को सहारा देते हैं, साथ ही दीवारों के साथ-साथ एक गलियारा-सा हैंाते हैं पीछे की दीवार पर एक गर्भगृहनुमा छवि तराशी गयी है, जिसमें बुद्ध अपनी धर्म-चक्र-प्रवर्तन मुद्रा में बैठे दर्शित हैं। पीछे, बायीं एवं दायीं दीवार में चार-चार कमरे बने हैं। यह दीवारें चित्रकारी से भरी हैं, जो कि संरक्षण की उत्तम अवस्था में हैं। दर्शित दृश्य अधिकतर उपदेशों, धार्मिक एवम् अलंकरण के हैं। इनके विषय जातक कथाओं, गौतम बुद्ध के जीवन, आदि से सम्बन्धित हैं।


Descrição das cavernas

A Gruta 1 é um mosteiro construído em forma de quadrado. A caverna possui um pátio aberto com varanda. Há uma estátua de Buda em posição sentada e suas mãos estão em dharmachakra pravartana mudra. Existem quatro células em cada lado esquerdo, traseiro e nas paredes da direita. Há três entradas e, entre elas, duas janelas quadradas são esculpidas para iluminar o interior da caverna. As pinturas nesta caverna retratam diferentes cenas dos contos de Jataka. As duas pinturas mais importantes incluem Padmapani e Vajrapani. Algumas outras pinturas incluem sibi, Sankhapala, Mahajanaka e muitos mais.

Este Vihara está localizado próximo à Gruta 1. A Gruta 2 é mais famosa por algumas das belas pinturas feitas nas paredes, tetos e pilares. As pinturas retratam contos de Hamsa, Vidhurapandita, kshanti Jataka. A maioria das pinturas na caverna 2 é baseada em mulheres em papéis proeminentes. A Gruta 2 é sustentada por muitos pilares lindamente ornamentados e esculpidos.

É um Vihara incompleto

Caverna 4
É o maior Vihara patrocinado por um devoto rico. Este está localizado em um nível um pouco mais alto em comparação com outro vihara, provavelmente porque a qualidade da rocha era muito melhor em comparação com o nível mais baixo. Acredita-se que tenha sido feito no século VI. A caverna tem uma imagem de Buda é a pose de pregação com o Bodhisattva em ambos os lados.

É um mosteiro incompleto com dimensões de 10,32 x 16,8 m. Exceto que a moldura da porta da caverna 5 não tem nenhuma obra arquitetônica ou pinturas. A moldura da porta tem figuras femininas de makaras. A construção da caverna foi provavelmente iniciada em 465 dC, mas foi abandonada posteriormente devido a questões geológicas.

É um mosteiro de dois andares que consiste em um santuário e um salão em ambos os níveis. Os dois níveis são considerados como Caverna 6 inferior e Caverna 6 Superior. O alpendre de pilares que existia na Gruta 6 inferior já não existe. A estátua de Buda está na pose de ensino em ambos os níveis. Apenas o nível inferior do cae 6 é concluído, o nível superior está incompleto. As paredes e a moldura da porta do santuário foram esculpidas com muito cuidado.

É também um mosteiro com um único piso. É composto por um santuário, um salão com pilares octogonais e oito pequenas salas para os monges que podem descansar durante suas viagens. Ao entrar na varanda e avançar para a antecâmara, podem-se ver & # xa0 esculturas sentadas, como 25 Budas entalhados e sentados em várias poses à esquerda da antecâmara. Pode ser devido a problemas geológicos a caverna 7 consiste em apenas dois pórticos, garbha griha com uma antecâmara.

Outro mosteiro inacabado que mais tarde foi usado como sala de armazenamento e gerador no século XX.

A caverna 9 é um dos mais antigos salões de oração (chaitya) nas cavernas de Ajanta. Foi escavado no século 1 aC. Os corredores da caverna são separados por 23 pilares. O salão também tem uma stupa e a stupa fica em uma base cilíndrica no centro da abside. O teto é abobadado e a estupa também tem um caminho de circunvolução ao seu redor. As pinturas desta caverna pertencem a dois períodos diferentes. Um na época da escavação e o outro período é por volta do século V. Algumas das pinturas incluem Buda em pé sobre os pilares, pinturas atrás da estupa incluem pinturas de Buda e Padmapani e Vajrapani.

É um grande salão de orações (chaitya), supostamente construído na funda do século I com a caverna 12, que é uma vihara. A caverna 10 tem dois corredores separados por 39 pilares com a estupa na extremidade absidal. A stupa é cercada pelo caminho pradakshina. A caverna tem importância histórica, pois em abril de 1819 um oficial do Exército britânico John Smith viu o arco e ficou muito interessado na arquitetura do mesmo. As pinturas pertencem a dois períodos. Algumas das pinturas na caverna retratam as histórias de Sama Jataka e Chhaddanta Jataka. Esta caverna é muito maior em comparação com a caverna 9.

É um Vihara construído no século V. Consiste em um salão com um grande banco e seis celas. Outro corredor termina com um santuário com a imagem de Buda sentado e também uma estupa incompleta. Algumas das pinturas importantes incluem Padmapani, uma figura feminina, um par de pavões.

De acordo com os arqueólogos, a Gruta 12 pertence ao primeiro período. A parte frontal deste Vihara está completamente destruída. Apenas o corredor central com quatro celas permanece intacto. Uma inscrição na parede diz que um comerciante chamado Ghanamadada presenteou esta caverna por volta do século 2 aC.

A Gruta 13 é um pequeno vihara que pertence ao primeiro período. É constituída por um Hall com sete celas e também duas camas de pedra.

A Gruta 14 é um mosteiro & # xa0 incompleto.

CAVE 15 pertence a Hinayana e foi construída no século V. É um vihara que consiste em oito salas de celas que têm um santuário, uma antecâmara e uma varanda com pilares. O santuário tem a imagem de Buda como postura sentada. A caverna 15A é a menor caverna com um corredor e uma célula de cada lado.

Localizada no centro do local, a caverna 16 foi patrocinada & # xa0 por Varahadeva, que era um ministro em Vakataka, rei Harisena. É um mosteiro Mahayana com uma porta principal e duas portas de corredor. O salão principal, que é um quadrado perfeito, é cercado por 14 celas. A caverna 16 tem muitas pinturas com histórias de contos de Jataka, como Hasti, Mahaummagga e Sutasoma. O garbha griha tem Buda em Dharma Chakra mudra. Há também um quadro em que a princesa Sundari fica muito feliz ao saber que seu marido se tornou monge. Algumas das pinturas estão incompletas.

É um vihara que pertence à seita Mahayana. A caverna 17 inclui um pórtico, uma antecâmara, muitos pilares com desenhos diferentes e grandes portas e janelas com belos entalhes de deus e deusa. A caverna também tem uma longa inscrição do Rei Upendragupta. Acredita-se que o rei também patrocinou cinco outras cavernas em Ajanta. Existem trinta grandes murais na caverna. & # Xa0

A caverna 17 tem muitas pinturas bonitas que explicam as várias poses de Buda, como Sikhi, Vipasyi, Sakyamuni, Visvbhu e Kasyapa. Muitas histórias Jataka como hasti, Hamsa, Sarabha miga, Sama, Mahisa, sibi e muitos mais.

É um pequeno espaço retangular & # xa0 com dois pilares octogonais.

É um Chaitya griha que pertence ao século V. A caverna 19 é famosa por sua bela escultura. A entrada da caverna está esplendidamente decorada com figuras esculpidas de Buda em diferentes estilos. Dois pilares redondos com motivos florais estriados e grinaldas esculpidas sustentam o alpendre. A caverna 19 também tem uma figura Naga com um dossel de serpente que protege Buda.

Existem também dois enormes Yakshas que são esculpidos em cada lado do arco de Chaitya. O salão de culto é abside e tem 15 pilares que o dividem em dois corredores laterais e uma nave lateral. As paredes e tetos dentro do corredor são cobertos com pinturas. Um Buda de pé é esculpido na frente da stupa. A coroa desta imagem quase toca o telhado.

É um mosteiro que pertence ao século V. Provavelmente doado por Upendragupta, este vihara consiste em uma varanda com uma cela em ambos os lados. O garbha griha mostra Buda em uma pose de pregação. A varanda também tem duas janelas cortadas em pedra para a entrada de luz. As molduras das portas têm uma forma quase estrutural.

É um mosteiro. Possui varanda e 12 pilares. Existem doze células & # xa0, das quais quatro têm alpendres com pilares. Garbha griha tem o ídolo de Buda em pose de pregação.

É um pequeno vihara com varanda e quatro celas incompletas. Buda está esculpido em pralamba padasana mudra. Pode-se também notar figuras pintadas da pose de Buda Manushi.

Este é um vihara incompleto que consiste em pilares e pilastras intrincadamente esculpidos em porteiros naga.

Mesmo esta é uma Vihara inacabada com um corredor, varanda com pilares. O ídolo de Buda em garbha griha está na pose de pralamba padasana mudra.

É um mosteiro escavado em um nível superior. Não tem santuário.

É um salão de adoração Chaitya griha que é semelhante à caverna 19. A caverna tem um salão absidal com corredores laterais e um ídolo de Buda está sentado com vários mudras. Uma das principais obras de arte inclui a representação de Mahaparinirvana de Buda na parede do corredor esquerdo junto com o ataque de Mara enquanto Buda fazia penitência. No centro da caverna está a estupa que tem o ídolo de Buda

É um mosteiro com dois pisos. O pavimento superior encontra-se parcialmente desmoronado e o inferior é composto por hall interno, quatro celas, antecâmara e garbha griha.

É um mosteiro inacabado

É um chaitya inacabado localizado entre as cavernas 20 e 21.

Supõe-se que seja uma das cavernas mais antigas que foram descobertas pela remoção de destroços das cavernas 15 e 16. Possui duas inscrições & # xa0 com escrita desconhecida.


Como os orientalistas britânicos foram responsáveis ​​pela redescoberta da história indiana

Os esforços britânicos levaram à descoberta de muitos locais históricos, incluindo as cavernas Sanchi stupas e Ajanta, e decifraram a escrita Brahmi, permitindo assim a reconstrução de um bom pedaço de nossa história

Portal sul da Stupa I em Sanchi. Crédito: Anandajoti Bhikkhu / Wikimedia Commons CC BY 2.0

Para uma geração criada com as críticas de Edward Said, pode ser uma surpresa que foram os orientalistas britânicos que redescobriram nossa herança artística e a tornaram acessível a todos nós. O chamado "olhar colonial", que os seguidores de Said descartam como apropriação colonial, assumiu a forma de muitas pinturas e gravuras maravilhosas de artistas britânicos visitantes, como Thomas Daniell e William Hodge, muito antes que a Grã-Bretanha adquirisse qualquer ambição imperial na Índia.

Jantar Mantar em Delhi. Uma pintura de Thomas e William Daniells, 1808. Crédito: Wikimedia Commons

E também havia Sir William Jones, o polímata brilhante que contribuiu mais do que qualquer outro indivíduo para o renascimento cultural nacional da Índia. Ao lado de seu trabalho diurno como juiz em Calcutá, Jones estudou e dominou o sânscrito, resgatou-o de um estreito monopólio brâmane, traduziu seus clássicos e usou a linguagem para desvendar as glórias de nosso passado hindu e budista há muito esquecido.

Ao contrário da Grécia e Roma antigas, o passado clássico da Índia não deixou nenhuma história escrita, então teve que ser reconstruído a partir de pavilhões perdidos e tesouros enterrados. Em 1784, com o patrocínio ativo do primeiro governador-geral britânico, Warren Hastings, Jones fundou a Sociedade Asiática para assumir essa tarefa gigantesca. Tornou-se o farol para um enorme exército voluntário de entusiasmados oficiais civis e militares britânicos que vasculharam o mofussil para ruínas e artefatos e escreveu artigos eruditos sobre eles.

Quando Jones voltou para a Inglaterra uma década depois, com a saúde abalada pelo excesso de trabalho, o asiático foi assumido por James Prinsep, outro polímata, cujo trabalho diurno era na casa da moeda de Benares, da East India Company. Os trabalhos de Prinsep produziram o maior avanço na historiografia indiana, a decifração da escrita Brahmi há muito esquecida e, por meio dela, a descoberta do império Mauryan que uniu o subcontinente no século 3 aC.

A tarefa começou com os enormes pilares de granito polido, o mais pesado pesando até 40 toneladas, que surgiram por todo o norte da Índia, inscritos com o que parecia ser alfinetes. Prinsep passou muitos anos transcrevendo meticulosamente centenas de inscrições de moedas e depois comparando-as com as dos pilares antes de finalmente quebrar o código da escrita Brahmi e decifrar os alfinetes como decretos do imperador mauryan Ashoka.

James Prinsep, responsável por decifrar a escrita Brahmi dos decretos da Ashoka & # 8217s. Crédito: Wikimedia Commons

Prinsep apresentou suas descobertas em um jornal ao asiático, então sofreu um colapso físico e mental e teve que ser enviado de volta para a Inglaterra, onde morreu logo depois. Os éditos de Ashoka anunciaram a conversão do imperador ao budismo, mas pouco ainda se sabia sobre esta religião obscura ou o homem que a fundou.

A descoberta das conexões indianas do Buda foi novamente o trabalho de dedicados exploradores britânicos. No final da década de 1790, um naturalista britânico, que ouviu relatos na Birmânia de que o Buda era um Bihari, rastreou as ruínas budistas de Bodh Gaya.

Nas décadas seguintes, as raízes indianas do Buda foram confirmadas pela escavação de uma série de estupas misteriosas em forma de cúpula. Primeiro veio a descoberta em 1819 de Sanchi por um oficial do exército britânico. Sanchi há muito jazia sepultado em florestas, escapando assim da destruição pelo renascimento hindu bramânico que exterminou o budismo indiano ou pelas invasões muçulmanas que destruíram tantos templos. As stupas se tornaram o foco de novas escavações pelo homem considerado o pai da arqueologia indiana, o tenente Alexander Cunningham dos Engenheiros Reais.

Em 1834, Cunningham usou suas habilidades de engenharia para perfurar profundamente na stupa principal em Sanchi, onde descobriu evidências de que o budismo havia sido difundido por vários séculos, desde o período Mauryan até o império Gupta. Ele começou a escavar uma grande coleção de esculturas budistas em Sarnath, a melhor das quais ele enviou para Calcutá. Em uma visita posterior, Cunningham ficou consternado ao descobrir que as esculturas que ele havia deixado para trás estavam sendo usadas para represar um rio próximo. Foi típico da batalha constante que os orientalistas britânicos travaram para resgatar seus achados do hábito indiano de usar pedras velhas para novas construções. Quarenta anos depois, quando Cunningham descobriu as ruínas do Vale do Indo em Harappa, ele encontrou tijolos do local que estavam sendo usados ​​para construir uma linha férrea.

Depois de se aposentar do exército como general, Cunningham passou o resto de sua longa vida liderando o recém-criado Archaeological Survey of India, que ainda administra nosso patrimônio artístico. Sua última grande descoberta foi a estupa de Bharhut, cheia de tesouros budistas mauryas que ele enviou ao Museu de Calcutá para serem restaurados pelo entusiástico vice-rei antiquário, Lorde Curzon.

Adoração em uma estupa, encontrada na estupa de Bharhut. Crédito: Douglas Galbi / Wikimedia Commons CC BY 3.0

Cunningham was struck by the fact that the large crowds of locals who watched his excavation at Bharhut were deeply disappointed that he unearthed no buried treasure. He grumbled in his diary, “… few natives of India have any belief in disinterested excavations for the discovery of ancient buildings…. ” As at Sarnath, when he returned three years later, every remaining stone of the Bharhut stupa had been removed by locals to build their homes.

Indian neglect for antiquity also extended to more recent monuments. British visitors to the later Mughals at the Red Fort were appalled to find both the Diwan-e-Am and Diwan-e–Khas turned into slums, their semi-precious, inlaid stones stolen from their marble friezes. Aurangzeb’s Moti Masjid in the Red Fort, already dilapidated with foliage growing through it in the early 1800s, was restored by the British, as was Humayun’s tomb and the Jama Masjid. The Taj Mahal was the Mughal monument most beloved of the British, who repaired it from the 1780s onwards.

Cunningham’s Buddhist excavations coincided with British discoveries of important Hindu temple ruins, ranging from Mahabalipuram in the south to the Elephanta and Kanheri caves near Mumbai and Khajuraho, with its then shocking eroticism, in Madhya Pradesh. The most influential discovery was Ajanta, with its wonderful frescoes dating back to the 1 st century BC.

It was a young British cavalry officer who stumbled on Ajanta during a hunting expedition. He braved fierce tigers and even fiercer Bhil tribals, then the main occupants, to explore the caves. In 1836, the Asiatic Society published his report on Ajanta’s classical wonders, and it provoked much debate as to whether the frescoes were Hindu or Buddhist and why sites like this had been abandoned in such remote places.

As the frescoes were deteriorating, it was decided to copy as well as conserve them. A Major Robert Gill, an artistic soldier, arrived at Ajanta and spent the next 27 years copying the paintings. His entire collection was shipped off to be exhibited in London, but tragically destroyed in the Crystal Palace fire of 1866. Gill heroically returned to Ajanta and started all over again, but died a year later. His work was continued for the next 13 years by John Griffiths of Bombay’s JJ School of Art. The results were displayed at the Victoria and Albert Museum in London and, in an extraordinary run of bad luck, again destroyed by fire. But luckily this time they had been photographed and could be published. The frescoes went viral in London, with photos in various magazines and even an Ajanta-style ballet at Covent Garden performed by the great Russian ballerina, Anna Pavlova.

An original painting of a dancing girl at Ajanta and its copy by Robert Gill. Credit: Wikimedia Commons

Ajanta encouraged the pioneering of a new approach to Indian art, giving it equal status with its Western counterparts. This was the life’s work of the art historian Ernest Havell, who came to India in 1890 as principal of the Madras School of Art and left 20 years later as head of the Calcutta School of Art. He celebrated the Indian aesthetic as being conceptual, rather than representational, its images stylised, not naturalistic as in Greco-Roman art, its emphasis on anonymous spirituality, rather than the individuality of its subject or the identity of the artist.

In 1910, at a stormy meeting of the Royal Society of Art in London, Havell clashed with his opponents, who maintained that India only excelled at decorative rather than fine art. Havell emphasised the continuity from ancient Ajanta down to recent Mughal miniatures of a distinctively Indian aesthetic, crediting the Indian artist with the ability ‘to see with the mind, not merely with the eye, to bring out an essential quality…” and to produce high art equal to anything in the West.

In recent times, the artistic discoveries of the Raj have raised questions of cultural ownership. The Indian equivalent of the Elgin Marbles demanded by Greece are the so-called Elliot marbles, also housed in the British Museum in London. The “marbles” are in fact pale limestone friezes from the Mauryan stupa at Amaravati in Andhra, intricately carved with scenes from the life of the Buddha. It was a Scottish revenue official, Sir Walter Elliot, who excavated the site in the 1840s and carted off some of the finest sculptures to the Madras Museum, whence some later found their way to the British Museum. Elliot’s career was typical of many Orientalists. While serving for 40 years as a civil servant in Madras, he was also a linguist, naturalist, ethnologist and numismatist and wrote learned books on everything from cobras and exotic birds to rare coins.

Today Elliot’s Marbles are displayed in a climate-controlled gallery specially created for them at the British Museum, as part of a global centre for the study of Buddhism. A demand for their return by the Archaeological Survey of India was politely declined in 2010. It’s hard to imagine that they would really be better appreciated or conserved in the land of their birth. The stupa at Amaravati is sadly neglected, while the Madras Museum’s collection of its sculptures is one of its least visited rooms. The cultural treasures the British took home with them are only a tiny fraction of what they salvaged, protected and left behind for us.


Don’t get us wrong. The Buddhist caves carved into the mountainside at Ajanta are cool. It’s just that after a while, you experience a sort of repetitious sensory overload (“Oh, this one has a Buddha at the back…just like the others…”).

So, in case you don’t have the time or inclination to explore all 30, we’ve listed our must-sees.

Kick things off with this cave, famous for its elaborately painted vihara, or monastery. The mural depicts two bodhisattvas: Avalokitesvara, the personification of compassion, and Vajrapani, the spiritual energy of the enlightened mind. These flank the doorway to the antechamber.

The Buddha, awash in green light and centered in the large shrine at the rear, sits cross-legged in the dharmachakrapravartana mudra teaching position and was sponsored by Emperor Harisena. In this mudra, the thumb and index finger of both hands touch at their tips to form a circle. This circle represents the Wheel of Dharma, or in metaphysical terms, the union of method and wisdom.

The coolest part of this cave is its ceiling, dominated by a large mandala decorated with birds, flowers, fruit and abstract designs.

This is the largest vihara in the complex, but it was a bit too ambitious — part of the ceiling is said to have collapsed and it wasn’t ever completed. Look up to see the undulating ceiling, which features a cool wavy pattern created by lava flows.

The exterior is gorgeous. We learned that all of these caves were carved top-down. The entranceway features sculptures of lunging lions, maidens clutching trees and dwarves adorned with garlands.

To the right is a bas-relief of a bodhisattva as Reliever of Eight Great Perils. Curious what those are? They were common dangers for pilgrims of the past: bandits, snakes, elephants, lions, disease, floods, forest fires and false imprisonment in foreign lands.

Enter through an impressive double portico richly carved with elephants, lions, lotuses and small stupas.

An oblong vihara monastery from the late 5th century, the garbha griha (inner sanctuary) contains a Buddha statue in a preaching pose, as well as a seated Buddha sheltered by the Naga Muchalinda, a snake-like being who protected him from the elements after his enlightenment.

This chaitya, or prayer hall, from the 1st century BCE is built on a rectangular plan. The interior is divided into three aisles by 21 unadorned octagonal columns.

A large stupa stands on a high cylindrical base at the center of the apse. Because figurative sculptures of the Buddha were not produced during this period, stupas were built to enshrine sacred relics that were most often worshipped and became synonymous with chaityas.

The inside of this cave is two stories high, with a barrel vault ceiling on which rafters and purlins are carved like a wooden building. Although those curious devices are structurally unnecessary, they’re an aesthetic method to mimic the interior spaces of temples.

A Theravada prayer hall, it’s thought to be the oldest cave temple at Ajanta, dating to the 2nd century BCE.

According to one of the inscriptions found in the hall, this cave was designed to “cause the attainment of well-being by good people as long as the sun dispels darkness by its rays!”

Its large central hall is supported by 20 octagonal pillars and bounded by 17 dormitory cells, where the monks slept.

A panel above the doorway depicts the seven Manushi Buddhas (fully illuminated beings in human form).

The detailed exterior carvings to the right of the façade are incredible. A pair of yakshas (nature spirits) are sculpted on either side of the entrance.

The arched roof of the interior hall is carved in imitation of wooden ribs, mimicking the interior spaces of structural temples.

An elaborate standing figure of Buddha, whose umbrella-like crown almost touches the vaulted ceiling, emerges from the mouths of sea monsters.

A reclining Buddha, representing his moment of death prior to attaining nirvana, is a popular feature here. (Wally calls this the “Sleepy-time Buddha.”)

The cave’s stupa has a sculpted figure of Buddha in pralamba padasana mudra, with both feet on the ground and legs apart, as if seated on a throne.

We saw a Sikh man practicing circumambulation (literally, “walking in circles”), a devotional practice where you walk around a sacred object like this stupa, chanting a mantra.

LUNCH WITH HANUMAN

After a morning of exploring the Ajanta Caves, we stopped at a dhaba roadside restaurant for some chana masala

On the way back to Aurangabad, we stopped at a dhaba, or roadside restaurant, for lunch and enjoyed a delicious meal of chana masala seasoned with cinnamon, chile paneer (homemade cheese) and chapatti (flatbread).

A monument to the monkey god Hanuman stood across the road. Hanuman is regarded as a the perfect symbol of selflessness and loyalty.

Worshipping him helps counter any bad karma you’ve racked up by acting selfishly. Hindus believe he bestows fortitude and the strength to overcome the trials of life. -Duke


Oldest historical structures in India known for their exquisite architecture

Our ancient roots dating back to hundreds of centuries is not something we ponder over too frequently. But if at all we do, the sheer richness and diversity of our history is bound to leave us spellbound. With primitive tools and calculation methods in a time when modern day building materials and technology was unimaginable, our forefathers built temples and cities that have survived till date.

Such ancient structures, which once formed the nerve-centre of trade, education, religion or culture, bowl us over with their engineering ingenuity, sculpture and designs even in this modern era of science and technology. We list some such oldest architectural marvels we can proudly look back to and call our own in this I-day special.

Centre Asks States to Ensure Lockdown Opening Up is ⟊refully Calibrated' No Crowding in Markets

With a decline in the number of active cases, many states and UTs have started relaxing restrictions. I would like to highlight that the decision to impose or ease restrictions has to be taken, based on the assessment of the situation at the ground level, Union Home Secretary said.

Legendary Indian Athlete Milkha Singh Passes Away Aged 91, After Battle With Covid

Legendary Indian athlete Milkha Singh, popularly known as ɿlying Sikh, passed away in a local hospital here at 11.30 pm on Friday, said a statement from the Post Graduate Institute of Medical Education & Research (PGIMER), Chandigarh, where he was being treated for Covid-related complications. Milkha was 91, and is survived by a son, ace golfer Jeev Milkha Singh, and three daughters. A former India volleyball captain, she was 85, and she too was affected by Covid and related complications.

Why don't you like this ad?

De AnúnciosO Vizinho Louco Obteve Karma Quando O Casal Comprou.

After so much drama and many police visits, she got the upper hand. Who would’ve thought that a small piece of paper has such power?

Raebareli Sees Slow Vaccination. Akhilesh's Remark Among Reasons, Say Locals

Against a projected population of almost 39 lakh as on date, only 2.12 lakh jabs have been given in Raebareli. Considering that 1.81 lakh of them are first doses, only about 4.6% of the district’s population has got jabbed so far.

Delhi Restaurants Can Stay Open Longer, Malls, Bars Back in Business from Tomorrow: FAQs Answered

Delhi Unlock: The statement of the DDMA also added that all schools, colleges, educational, training and coaching institutions will remain closed.

SC Ignores Law, Misinterprets Delhi HC’s Vital UAPA Bail Orders

This means that the Delhi HC’s orders cannot be cited by any other persons accused of offences under the UAPA.


Ajanta, cave 10, chaitya-griha, with votive stupa

The Ajanta Caves in Aurangabad district of Maharashtra, India are about 30 rock-cut Buddhist cave monuments which date from the 2nd century BCE to about 480 or 650 CE. The caves include paintings and sculptures described by the government Archaeological Survey of India as "the finest surviving examples of Indian art, particularly painting", which are masterpieces of Buddhist religious art, with figures of the Buddha and depictions of the Jataka tales. The caves were built in two phases starting around the 2nd century BCE, with the second group of caves built around 400–650 CE according to older accounts, or all in a brief period of 460 to 480 according to the recent proposals of Walter M. Spink. The site is a protected monument in the care of the Archaeological Survey of India, and since 1983, the Ajanta Caves have been a UNESCO World Heritage Site.

The Ajanta caves are cut into the side of a cliff that is on the south side of a U-shaped gorge on the small river Waghur, and although they are now along and above a modern pathway running across the cliff they were originally reached by individual stairs or ladders from the side of the river 10–35 m below.

The area was previously heavily forested, and after the site ceased to be used the caves were covered by jungle until accidentally rediscovered in 1819 by a British officer on a hunting party. They are Buddhist monastic buildings, apparently representing a number of distinct "monasteries" or colleges. The caves are numbered 1 to 28 according to their place along the path, beginning at the entrance. Several are unfinished and some barely begun and others are small shrines.

The caves form the largest corpus of early Indian wall-painting other survivals from the area of modern India are very few, though they are related to 5th-century paintings at Sigiriya in Sri Lanka. The elaborate architectural carving in many caves is also very rare, and the style of the many figure sculptures is highly local, found only at a few nearby contemporary sites, although the Ajanta tradition can be related to the later Hindu Ellora Caves and other sites.

The four completed chaitya halls are caves 9 and 10 from the early period, and caves 19 and 26 from the later period of construction. All follow the typical form found elsewhere, with high ceilings and a central "nave" leading to the stupa, which is near the back, but allows walking behind it, as walking around stupas was (and remains) a common element of Buddhist worship (pradakshina) The later two have high ribbed roofs, which reflect timber forms, and the earlier two are thought to have used actual timber ribs, which have now perished. The two later halls have a rather unusual arrangement (also found in Cave 10 at Ellora) where the stupa is fronted by a large relief sculpture of the Buddha, standing in Cave 19 and seated in Cave 26.

Caves 9 and 10 are the two chaitya halls from the first period of construction, though both were also undergoing an uncompleted reworking at the end of the second period. Cave 10 was perhaps originally of the 1st century BCE, and cave 9 about a hundred years later. Os pequenos "quotshrinelets" chamados de cavernas 9A a 9D e 10A também datam do segundo período e foram encomendados por indivíduos.

As pinturas na caverna 10 incluem algumas sobreviventes do período inicial, muitas de um programa incompleto de modernização no segundo período e um grande número de imagens intrusivas tardias menores, quase todos Budas e muitos com inscrições de doadores de indivíduos. A maioria evitou pintar em excesso o programa & quotoficial & quot e, depois que as melhores posições foram usadas, são colocadas em posições menos proeminentes ainda não pintadas. O total dessas (incluindo as agora perdidas) era provavelmente superior a 300, e as mãos de muitos artistas diferentes são visível.


Visão Geral

Embora existam inúmeros livros de arte sobre as pinturas de Ajaṇṭā para o público em geral com belas imagens, as obras acadêmicas que fornecem visões gerais precisas e abrangentes do site são bastante limitadas. Quanto aos relatos detalhados sobre as características arquitetônicas das cavernas, os primeiros relatórios de Burgess 1879, Fergusson e Burgess 1880 e Burgess 1883 fornecem informações úteis. Spink 2007, que consiste em vários volumes do autor no local, elaborou ainda mais os relatos de Burgess das cavernas com base em seu estudo de meio século no local. Ghosh 1967 fornece uma visão geral acadêmica abrangente sobre a arquitetura, escultura e pinturas de Ajaṇṭā. Para uma visão mais compacta do site, Mitra 1992 teve uma boa reputação por muitos anos, embora a cronologia das cavernas e as identificações das pinturas neste livro permaneçam inalteradas desde sua primeira edição em 1956. Huntington 1985 e Jamkhedkar 2013 abordam isso problema e nos fornecer informações adequadas e atualizadas sobre o site, escultura e pinturas com base em bolsa de estudos recente.

Burgess, James. Notas sobre os templos de Bauddha Rock de Ajanta, suas pinturas e esculturas, e sobre as pinturas das cavernas de Bagh, mitologia moderna de Bauddha, & amp c. Bombay: Government Central, 1879.

Um dos primeiros relatos acadêmicos sobre as cavernas Ajaṇṭā por um estudioso pioneiro da arqueologia indiana. Inclui relatos bastante descritivos de cavernas, pinturas em cada caverna e inscrições. Além do texto, o livro também inclui muitos desenhos, planos de elevação para mostrar a localização das pinturas e algumas manchas das inscrições.

Burgess, James. Relatório sobre os templos da caverna budista e suas inscrições, levantamento arqueológico da Índia Ocidental. Vol. 4. Londres: Trübner, 1883.

Este volume foi publicado como o volume suplementar de Fergusson e Burgess 1880. Inclui um capítulo (pp. 43–59) que descreve os detalhes arquitetônicos de cada caverna em Ajaṇṭā com muitos planos e ilustrações. O capítulo 14 (pp. 116, 124-138) também lista vinte e quatro inscrições de Ajaṇṭā nas cavernas 9, 10, 16, 20, 26 com transcrições e traduções. Uma reimpressão foi publicada pela Indological Book House (Varanasi) em 1964.

Fergusson, James e James Burgess. Os templos das cavernas da Índia. Londres: W. H. Allen, 1880.

Este primeiro volume abrangente sobre templos escavados na rocha na Índia poupa três capítulos para as primeiras cavernas ou cavernas “Hīnayāna”, posteriores ou cavernas “Mahāyāna” e “as mais recentes” cavernas (século 7 EC) de Ajaṇṭā (pp. 280–346). Cada capítulo inclui uma descrição detalhada das cavernas e das pinturas de parede e inscrições sobreviventes. Uma reimpressão foi publicada pela Cambridge University Press em 2013.

Ghosh, A., ed. Murais de Ajanta. Nova Delhi: Pesquisa Arqueológica da Índia, 1967.

Ao contrário de inúmeros “livros de arte” sobre pinturas de Ajaṇṭā com muitas placas, esta publicação ASI nos fornece uma visão geral abrangente do local, escultura e pinturas de Ajaṇṭā, como o contexto histórico do local, estudos iniciais e análises científicas sobre a pintura materiais. Bibliografia anexada também é útil, pois lista os primeiros estudos sobre Ajaṇṭā no final do século 19 e início do século 20.

Huntington, Susan L. e John C. Huntington. A Arte da Índia Antiga: Budista, Hindu, Jain. Nova York e Tóquio: Weather Hill, 1985.

Este volume abrangente sobre a história da arte indiana antiga tem um capítulo (capítulo 12) sobre a arquitetura de cavernas budistas do século V ao século VII dC. Ele fornece uma boa visão geral das pinturas, esculturas e arquitetura das cavernas de Ajaṇṭā, mas também dos locais relacionados, incluindo Bāgh, Kanheri, Aurangabad e Ellora. A bibliografia anexa é útil para compreender os estudos recentes sobre o assunto.

Jamkhedkar, Arvind P. Ajanta. Oxford: Oxford University Press, 2013.

O mais recente guia de Ajaṇṭā escrito por um ex-diretor da Arqueologia Estadual de Maharashtra. Além das descrições de cada caverna (capítulo 5), ele resume bem as principais questões dos locais, incluindo o patrocínio, desenvolvimento arquitetônico, data das cavernas (c. 200 AC - 525 DC em sua visão) e identificação das pinturas e esculturas, apresentando os resultados de pesquisas recentes.

Mitra, Debala. Ajanta. 10ª ed. New Delhi: Archaeological Survey of India, 1992.

Um guia compacto e amplamente disponível publicado pela ASI. Ele fornece informações gerais, mas adequadas, sobre a história das cavernas e as principais esculturas e pinturas de cada caverna. Seguindo a cronologia tradicional, ele data a fase tardia das cavernas entre o final do século 5 e o século 7 EC e sugere a continuação do local durante os séculos 8–9 EC.

Spink, Walter. M. Ajanta: História e Desenvolvimento. Vol. 5, Caverna por Caverna. Leiden, Holanda e Boston: Brill, 2007.

Este volume, que constitui uma parte dos cinco volumes de Spink sobre Ajanta, fornece características-chave de pilares, dobradiças de portas, buracos, planos de cada caverna para que eles apoiem sua breve cronologia do local (para sua breve cronologia, ver Spink 1967 e Spink 2005–2009, citado em Cronologia das Cavernas).

Os usuários sem assinatura não podem ver o conteúdo completo desta página. Por favor, assine ou faça o login.


Assista o vídeo: Ajanta Caves, Maharashtra, India in 4K Ultra HD (Pode 2022).